युवाओ के भविष्य को बर्बाद कर रहे नशे की रोकथाम के लिए जागरूकता और सख्त कार्यवाही दोनों जरूरी : मिगलानी।
मीडिया ग्रुप, 23 अक्टूबर, 2026
नशे के सौदागरों पर कानून का प्रहार,
युवाओं को उपचार और परिवारों को आधार।
नशामुक्त युवा, सुरक्षित परिवार,
यही हो स्वस्थ समाज का आधार।”
हरिद्वार। नशा आज समाज के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर खड़ा है। यह युवाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और भविष्य को बर्बाद करने के साथ-साथ परिवारों की खुशियाँ भी छीन रहा है। नशे की गिरफ्त में आकर अनेक युवा अपने जीवन के महत्वपूर्ण अवसर खो देते हैं, जबकि उनके माता-पिता और परिजनों को मानसिक, आर्थिक एवं सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय, नैनीताल के अधिवक्ता ललित मिगलानी ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि नशे की समस्या का समाधान केवल जागरूकता कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसके लिए सामाजिक सहभागिता, प्रभावी पुलिस कार्रवाई, कानूनी जागरूकता और नशे की लत से पीड़ित व्यक्तियों के उपचार एवं पुनर्वास पर भी विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि भारत में मादक पदार्थों एवं मनःप्रभावी पदार्थों से संबंधित अपराधों पर नियंत्रण के लिए स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) लागू है। इस अधिनियम के अंतर्गत प्रतिबंधित मादक पदार्थों का अवैध उत्पादन, निर्माण, कब्जा, खरीद-बिक्री, परिवहन और तस्करी जैसे कृत्य संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुसार दंडनीय हैं। अपराध की प्रकृति, मादक पदार्थ के प्रकार और बरामद मात्रा के आधार पर सजा निर्धारित होती है। व्यावसायिक मात्रा से संबंधित अपराधों में कठोर कारावास का प्रावधान है। इसी प्रकार, अधिनियम की धारा 27 के अंतर्गत निर्दिष्ट मादक पदार्थों के सेवन के लिए भी दंड का प्रावधान है।
उन्होंने कहा कि नशे के अवैध कारोबार में संलिप्त व्यक्तियों के विरुद्ध कानून के अनुसार प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए। पुलिस एवं संबंधित प्रवर्तन एजेंसियों को नशे की आपूर्ति करने वाले नेटवर्क, अवैध बिक्री और तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए समन्वित प्रयास करने चाहिए। आम नागरिकों को भी संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी संबंधित पुलिस अधिकारियों को देनी चाहिए।
श्री मिगलानी ने स्पष्ट किया कि नशे के अवैध कारोबार में संलिप्त व्यक्तियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन नशे की लत से जूझ रहे युवाओं को केवल सामाजिक तिरस्कार का सामना करने के लिए छोड़ देना उचित नहीं है। उन्हें चिकित्सकीय सहायता, काउंसलिंग, पारिवारिक सहयोग और पुनर्वास के अवसर मिलने चाहिए।
उन्होंने बताया कि NDPS अधिनियम में निर्धारित शर्तों के अधीन कुछ मामलों में स्वेच्छा से मान्यता प्राप्त या सरकारी अस्पताल अथवा संस्थान में नशामुक्ति उपचार लेने वाले नशे के आदी व्यक्तियों को अभियोजन से प्रतिरक्षा का प्रावधान है। यह सुविधा प्रत्येक मामले में स्वतः लागू नहीं होती, बल्कि अधिनियम में निर्धारित पात्रता एवं शर्तों पर निर्भर करती है।
श्री मिगलानी ने अभिभावकों से अपील की कि वे अपने बच्चों के व्यवहार, मित्र-मंडली और मानसिक स्थिति के प्रति सजग रहें तथा उनके साथ संवाद बनाए रखें। विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में नियमित कानूनी जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए, ताकि युवाओं को नशे के स्वास्थ्य संबंधी दुष्परिणामों और इसके कानूनी परिणामों की जानकारी मिल सके।
उन्होंने प्रशासन, पुलिस, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक संगठनों से आग्रह किया कि वे मिलकर नशामुक्त समाज के निर्माण के लिए ठोस कदम उठाएं। नशे के अवैध कारोबार के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई के साथ-साथ नशे से प्रभावित युवाओं को मुख्यधारा में वापस लाने के प्रयास भी किए जाने चाहिए।



